Skip to main content

निजी जीवन में पुलिस की नई भूमिका

निजी जीवन में पुलिस की नई भूमिका

पिछले दिनों उड़ीसा के गंजम जिले के पाटापुर थाना प्रभारी एस.एल.के. प्रसाद ने कहा कि अपराध रोकने के अलावा भी पुलिस की कुछ जिम्मेदारी होती है । इस थाने में पिछले छह महीने में तीन शादियां कराई जा चुकी हैं । २२ साल के श्याम गौड़ २० साल की राजेश्‍वरी से हाल ही में थाने के अंदर ही परिणय सूत्र में बंधे । लड़के के घर वाले शादी के लिए राजी नहीं थे । झगड़े का बहाना बना कर श्याम के पिता लड़की वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने थाने गए थे, जिससे पुलिस को दोनों के बीच के प्रेम-प्रसंग का पता चला । थाना प्रभारी ने दोनों परिवारों को बुलाकर समझाया और बाद में उनकी उपस्थिति में थाने में ही शादी संप‍न हुई ।
गंजम पुलिस की यह कार्यवाही पुलिस की खास किस्म की छवि से आतंकित समाज के लिए आश्‍चर्यचकित कर सकती है । जिस तरह उड़ीसा के एस. एल. के. प्रसाद ने अपने स्तर पर लोगों में मेलमिलाप की प्रक्रिया शुरू की है, उसी तरह इधर दिल्ली हाई कोर्ट से खबर आई है कि उसने दंपतियों के बढ़ते तनाव के मद्‌देनजर एक मध्यस्थता सेल का गठन किया है । इसके लिए उसने कई जगह विज्ञापन लगवाए हैं । इसके अलावा लीगल ऐड कमिटी ने एक महीने के लिए १० एफएम चैनलों के १२ स्लॉट मध्यस्थता सेल के प्रचार के लिए बुक कराए हैं । इस तरह के मध्यस्थता केंद्र (मीडिएशन सेंटर) फिलहाल दिल्ली की विभिन्‍न अदालतों तथा नानकपुरा स्थित क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल से संचालित हो रहे हैं । बताया जा रहा है कि दिनोंदिन इन केंद्रों की लोकप्रियता बढ़ रही है । इन केंद्रों पर सबसे ज्यादा केस २५-३० साल के बीच के उम्र के आए हैं । नानकपुरा केंद्र में प्रतिदिन ४-६ केस रजिस्टर हो रहे हैं ।
इन मध्यस्थता केंद्रों को समाज में तलाक की बढ़ती हुई दर पर चिंताओं की प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा सकता है । सरकारी स्तर पर इन उपायों का मकसद समाज में परिवार टूटने को लेकर बढ़ती बेचैनी को देखते हुए इस मसले का कोई हल खोजना है । ऐसी ही एक पहल दिल्ली महिला आयोग ने भी की । उसने विवाह पूर्व सलाह-मशवरा केंद्र के निर्माण के बारे में जोरशोर से प्रचार किया । इसके लिए विज्ञापन देकर कौंसिलरों के आवेदन मंगाए गए और चुने हुए कौंसिलरों को विशेषज्ञों से ट्रेनिंग दिलवाई । इन कौसिलरों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे केंद्र में पहुंचने वाले ऐसे युवा-युवतियों की काउंसलिंग करेंगे जो विवाह करने जा रहे होंगे । हालांकि अभी इसका कोई अंदाजा नहीं मिला है कि गाजे-बाजे के साथ शुरू की गई इस योजना में फिलहाल क्या प्रगति है । पर इस कड़ी में उल्लेखनीय यह है कि केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने भी इस दिशा में एक कदम उठाते हुए देश भर में चल रहे महिला विकास केंद्र- जो बोर्ड के आर्थिक सहयोग से विभिन्‍न गैरसरकारी संगठन चलाते हैं- का नाम बदल कर फैमली काउंसलिंग सेंटर’ अर्थात परिवार परामर्श केंद्र कर दिया है । वैसे तो इस तरह के परिवार परामर्श केंद्र बनाने की यह प्रक्रिया एनडीए सरकार के शासनकाल में शुरू हुई थी, लेकिन उस दौरान तमाम विरोधों के चलते यह फैसला लागू नहीं हो सका था । बाद में इसे यूपीए सरकार ने लागू किया । बहरहाल, अच्छी बात यह है कि अब परिवार- उनके अंदर के विवाद, उनका टूटना आदि विषय सरकार, अदालत, थाना तथा गैरसरकारी संस्थाओं आदि सभी के सरोकार के विषय बन रहे हैं ।
अभी तक परिवारों के अंदर पैदा होने वाले विवादों की जानकारी समाज के भीतर से निकलकर इस तरह बाहर नहीं आ पाती थी कि सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएं उनके समाधान का कोई हल खोज सकें । पुलिस की मध्यस्थता और संस्थाओं की मदद से इन समस्याओं के हल की कोई आसान राह अवश्य खुल सकती है, क्योंकि दंपतियों के परस्पर संबंधों और तालाक जैसे मामलों को सुलझाने को लेकर कायम रही झिझक अब टूट रही है । अब दंपति आपसी रिश्तों की शिकायत लेकर बाहरी इकाइयों के पास मदद के लिए निःसंकोच पहुँचने लगे हैं । ऐसा भी माना जा सकता है कि निजी दायरा अब खुल रहा है और बंद दरवाजों के पीछे मतभेद, तनाव तथा अन्याय अब भीतर ही दफन हो जाने के लिए बाध्य नहीं रह गए हैं । स्त्री आंदोलन ने भी तो पर्सनल इज पॉलिटिकल का नारा दिया था । लेकिन दूसरी तरफ यह भी सोचने की बात है कि दो बालिग या समझदार लोगों के बीच आपसी रिश्ता तय करने के लिए इतने बड़े पैमाने पर पुलिस की मध्यस्थता की जरूरत क्यों पड़ने लगी? लोग मसलों को स्वयं निपटा लेने के सक्षम क्यों नहीं बन रहे? साथ जीवन व्यतीत करने का फैसला लेने से पहले कैसे साथ-साथ रहना है-इसकी योजना ठीक से क्यों नही बनती या समस्या कहां है, इसे चिन्हित करने में वे असफल होते हैं? असल में मामला सिर्फ दो व्यक्‍तियों के अहम की टकराहट का नहीं होता है, बल्कि दायित्व बोध का अभाव और गैरवाजिब अपेक्षाओं का भी होता होगा । चूंकि पुराने हालात और वास्तविकताएं बदल रही हैं, इसलिए नई स्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप परिवारों का पुनर्गठन होना चाहिए ।
लेकिन इसके बावजूद अगर किसी अन्य हस्तक्षेप या प्रयास से दो लोग अपनी गलतफमी दूर कर पुनः शांति से जीवन जीने लगते हैं, तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । लेकिन यह भी समझना चाहिए कि हर तनाव सिर्फ गलतफहमी से पैदा नहीं होता है । लिहाजा सारे उपायों के बाद भी उन समस्याओं का निदान मुमकिन नहीं तो रहा हो, तो बेहतर होता है कि किसी का सुकून न छीन कर कोई नया ही रास्ता तलाशा जाए । इस काम में भी मध्यस्थ की भूमिका अपनाती पुलिस और सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएं मददगार साबित हो सकती हैं । -अंजलि सिन्हा

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन …