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तुम मुझे पालो मैं तुम्हारा भरण पोषण करूँगी.. गौ माता

भारतीय संस्कृति में गाय को बहुत ही श्रद्धा भाव से देखा जाता है । गौ को माँ का दर्जा देते हुए इसे देवों का कल्याण करने वाली माँ की उपमा दी गई है । वेदों, पुराणों व सभी हिन्दू धर्म ग्रन्थों में इसे सर्वदेवमयी गौ माता कहा गया है । जीवन के सभी संस्कारों में गौ पूजा व गौदान करना कल्याणकारी माना जाता है । अब तक धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार इसके दूध को अमृत व इसके गोबर, गौमूत्र व दूध से बनने वाले दही व घी को भी सर्वोत्तम माना जाता था । इन पांचों को मिलाकर बनने वाले पंचगव्य ओ महाऔषधि कहा गया है । अब औषधी विज्ञान व इस क्षेत्र के खोज कर्त्ताओं ने पंचगव्य व इसके दूध दही घी गोमूत्र व गोबर के गुणकारी होने व इनके औषधिय गुणों की पुष्टि की है । पर दुख की बात यह है कि हम धर्म परायण हिन्दू होकर भी, गौ को माँ मानकर भी गौ माता के मामले मे आर्थिकता के ब्झ से दब कर अस्तिकता को चुपचाप मरने देते हैं, और आज के भौतिक विलास के नशे में खोये हुये अपने आज को सँवारने के लिये आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को निगलते हुए प्रकृति के सन्तुलन को खत्म करने पर तुल्य हुये हैं । यह बात सही है कि जब तक पेट भूखा होगा तो धर्म कर्म की सभी बातें बेकार हैं । लोकोक्‍ति भी है । भूखे पेट न भजन गोपाला, यह ले अपनी कंठी माला पर गौमाता के मामले में ऐसी बात नहीं है गौमाता तो हमें सचमुच पुकार कर कह रही है । तुम मुझे पालो मैं जीवन भर तुम्हारा भरण पोषण करूंगी । मैं इस कथन का आँकड़ों सहित विश्लेषण कर रहा हूं, जोकि गणित व विज्ञान के हिसाब से शत्‌-प्रतिशत्‌ सही आएगा । अगर हम बेरोजगारी की मार से घायल हुए गौ पालन शुरू करें तो शुद्ध दूध को प्राप्त कर रोजगार पाते हुए प्रकृति को संतुलित कर आने वाली पीढ़ियों का बहुत भला कर सकते हैं । उदाहरणतः अगर हम गाँवों से गौ पालन शुरू करें तो गाय पालकर रोजी रोटी जुटाई जा सकती हैं । घर मे माता-बहनें व हम स्वयं बिना व्यक्‍ति रखे एक या दो गाय घर में पाल सकते हैं । यदि गाय कम से कम ५-६ किलो दूध देने वाली हो तो एक गाय ७५ से ९० रूपये का प्रतिदिन दूध दे सकती है । अपने दूध देने के काल के ३०० दिनों २२५०० से २७००० रूपये का दूध हमें दे सकती है । यदि उसका खर्चा गिनें तो हरा चारा १५ किलो १५ रूपये का ३ किलो तुड़ी ८ या ९ रूपये की व २.५ किलो फील्ड २० या २२ रूपये की कुल ४५ रूपये रोज का ३६५ दिनों में लगभग १६५०० रूपये का खर्च आयेगा । तो इस हिसाब से एक गाय साल भर में ६ से १० हजार रूपये वार्षिक आय एक गाय से प्राप्त की जा सकती है । अगर गाय के दूध देने की क्षमता ज्यादा होगी तो खर्चा कम पड़ेगा व कमाई ज्यादा बढ़ेगी । सभी वस्तुओं के भाव पंजाब मेरे शहर के भावों के अनुसार है अगर कही तूड़ी चारा व फील्ड भाव कम ज्यादा होंगे तो दूध के भाव भी उसी अनुपात में कम ज्यादा होंगे । और इसके साथ ही गाँव में हरे चारे की एक दुकान खुल सकती है । कम से कम दो या तीन व्यक्‍ति रोजगार पा सकते हैं । उस दुकान पर बैलगाड़ी से जुतने वाले एक बैल को सहारा मिल सकता है । इससे हम अपनी आय को बढ़ाते हुऐ देश को दूध के उत्पादन में आत्मनिर्भर करते हुऐ पूरे देश का स्वास्थ्य सुधार सकते हैं । गाय के नर वंश की समस्याउपर लिखी नीति के अनुसार हम चलें तो मादा गौवंश को सम्भालने में कोई परेशानी नहीं है और वसे भी आजकल खुले घूमने वाले गौधन में केवल गाय का नरवंश ही नजर आता है क्योंकि आजकल हम बैलों का उपयोग छोड़ चुके हैं । आस्था से बंधे होने के कारण हम बैल व सांड को कटने नही देते । आर्थ्क लोभ व आधुनिकता से बँधे होने के कारण हम इनको पाल नहीं रहे । अगर प्रत्येक किसान जो समर्थ हो छोटे छोछे कामों के लिए एक या दो बैल रखले बैलगाड़ी रखे तो इससे गौवंश को तो सहरा मिलेगा, ट्रैक्टर का डीजल बचेगा । डीजल धुएँ से होने वाले प्रदूषण से मुक्‍ति मिलेगी । नर गौवंश की समस्या से निजात पाने के लिए शहरों में घूमने वाले नर गौवंश की नसबंदी करवा कर सरकारें व समाज सेवी संस्थाएँ इन्हें बैल बनाकर उन क्षेत्रों में भेज सकती है । जहां किसान छोटे हैं और बैलों का उपयोग करते हैं । बैल वहां के किसानों को देने से ये गौवंश सम्भल जायेगा व किसानों को भी खेती के लिए बैल मिल जायेंगे । रही बात विदेशी गौवंश की तो उसके बारे में जो तरह की विचारधारा चल रही है तो उसके बारे में सबसे पहले हमे अपने मानसिकता को केन्द्रित करना होगा कि हम इसको माने या न माने अगर हम जरसी गाय (अमेरिकन गाय) को गौवंश मानते हैं तो हमें इसकी रक्षा करनी होगी । अहर हम इसे गाय नहीं मानते तो दूध के लिये इसे पालें परन्तु इसके नरवंश को कटने पर भैंस के नरवंश के कटने जैसी भावनायें हे अपनानी होंगी । जब तक हम एक धारा के साथ बँधकर हम अपनी एक राय और मनोस्थिति नहीं बनाते तो ये समस्या हमें विचलित करती रहेगी । अगर हम जरसी गाय या संकर नस्ल को भी गौवंश मान लेते हैं तो जरसी गाय या संकर नस्ल की मादा गाय का दूध देने में कोई सानी नहीं है सो इसकी सम्भाल का मुद्‌दा अपने आप हल हो जाता है । हां इस गाय में कई बार गर्भधान की समस्या उत्पन्‍न जरूर हो जाती है और बार-बार की कोशिशों के बावजूद भी गाय नये दूध नहीं दे पाती है । उस समय इस गाय को सम्भाल पाना नामुमकिन हो जाता है परन्तु उसका भी हल नेशनल डेयरी अनुसन्धान केन्द्र, करनाल की खोज अनुसार एक नियमि मात्रा में विधि अनुसार हारमोन प्रोजीस्टोन, स्टील बास्टरोल व डैक्सोना इंजैक्शन चमड़ी के नीचे देकर आठ दस दिन के इलाज के बाद गाय बिन ब्याये भी एक एक महीने में अपनी दूध की क्षमता का ८० प्रतिशत दूध देने लगती है । अगर उसे कोई अन्दरूणी रोग न हो तो व एक साल तक दूध देते देते गर्भधारण करने की स्थिति में भी आ सकती है । हालांकि कुछ धर्म प्रेमी इस अप्राकृतिक ढंग को कुदरत से छेड़ छाड़ कहते हुए इसका विरोध करते हैं और दूध के जहरीला होने की बात भी करते हैं लेकिन दूध की क्वालिटी के बारे में इसका विरोध करने वालों के पास इस दूध के जहरीला होने का कोई वैज्ञानिक आधार व टैस्ट नहीं है और कम से न ही मेरे पास प्सका कोई वैज्ञानिक टेस्ट है परन्तु एक बात निश्‍चिन्त है कि इस लैक्टैशन इंडैक्शन विधि से गाय बिना ब्याये दूध देना प्रार्म्भ कर देती है । अगर हम आस्था के उपर आर्थिकता को भी तरजीह दें तो गाँव में घूमने वाले खुले गौवंश के बारे में सोचे । तो प्रत्येक गाँव में घूमता हुआ ये गौवंश समूह अपनी भूख मिटाने के लिए जिस भी खेत में घुस जाये वहाँ पर एकड़ आधा एकड़ फसल का नुकसान कर देता है और बेचारा किसान रखवाले रखकर भी इसे भगाने की कोशिश करता है । रखबालों पर भी वर्ष भर में भारी खर्च आता है । इस खुले घूमने वाले गौवंश की आदतें भी जंगली जैसी होने के कारण सड़क पर या गाँव में लोग अक्सर घायल होत रहते हैं । अगर हम गाय के झुण्ड के द्वारा गाँव में प्रतिदिन आधा एकड़ फसल को नुकसान की बात मानकर हिसाब लगाएँ तो प्रत्येक गाँव में १८२ एकड़ फसल का नुकसान वर्ष भर में हो जाता है । अगर गेहूँ की फसल का अन्दाजा लगाएँ तो वर्ष भर में ४० मन प्रति एकड़ झाड़ के हिसाब से ७२८० मन अर्थात करीब ३००० क्विंटल गेहूँ और ३००० क्विंटल तूड़ी प्रत्येक गाँव से ये झुण्ड खा जाते हैं । जो प्रत्येक गाँव में ५० से १०० तक की गिनती में होते है । इस नुकसान के अलावा रखवालों का वेतन, इनके द्वारा होने वाली दुर्घटनाओं पर खर्च व जीवन क्षति अलग है । इसका निदान है अगर प्रत्येक गाँव में १००-१०० गायों के गौआश्रम बनाकर फसल के समय तूड़ी भण्डारण से व इन्हीं के द्वारा नुकसान की जाने वाली ३००० क्विंटल गेहूँ पूरे गाँव वासी मिल बांटकर न्हें दे दें तो इससे गौवंश सम्भल जायेगा व इस गौआश्रम में इनके गोबर की खाद से वहाँ काम करने वाले व्यक्‍तियों के वेतन का कुछ हिस्सा भी निकल सकता है । कुछ वर्षों में दुधारू गायों को रखकर प्रत्येक गाँव में आदर्श गौशाला का निर्माण कर गौ सेवा से मोक्षदायनी गौमाता का आशीर्वाद लिया जा सकता है । वैसे भी भारत के अधिकतर धर्म व जातीय समूह गौ को माँ व धर्म का प्रतीक मानते हैं व अपनी सामर्थ्य व श्रद्धानुसार गौ ग्रास हेतु दान इत्यादि देते रहते हैं । इसलिए प्रत्येक गाँव में अगर पंचायत की एक दो एकड़ जमीन में गौआश्रम बनाये जाये तो यह बहुत बड़ा धर्म होगा और गौ माता की पूजा होगी । मैं तो सरकार से भी आग्रह करूँगा कि वह इस पुनीत कार्य के लिए प्रत्येक गाँव में १००-१०० गाय को रखने हेतु गौआश्रम बनवाकर एन. जी. ओज. को सौंप दे तो यह बहुत पुनीत कार्य होगा और दूध के लिए श्‍वेत क्रांति का मील का पत्थर बन जायेगा ।
रजिन्द्र बांसल

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