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पंचायतों के मध्ययुगीन क्रूर फैसले

महात्मा गाँधी पंचायती राज के प्रबल समर्थक थे परन्तु उन्होंने सपने में भी इसके विद्रूप चेहरे की कल्पना न की होगी । पंचायती राज व्यवस्था स्व० राजीव गाँधी का भी सपना था । कुछ राज्यों में यह व्यवस्था लागू भी है परन्तु पंचायतों के कुछ फैसलों से मानवीय संवेदना तार-तार हो चुकी है । इन फैसलों ने पंचायतों के अधिकार की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता पैदा कर दी है । पहला पश्‍चिमी उत्तरप्रदेश के देवबन्द के फुलास गाँव की दूसरी अयोध्या फैजाबाद की है । विगत १४ जून को फुलास के आसपास आठ गाँवों की पंचायत बुलायी गई थी । पंचायत में चर्चा के बाद फैसला हुआ गाँव की कोई भी महिला अकेले गाँव से बाहर कदम नहीं रखेगी । महिला के साथ उसके परिवार का कोई न कोई मर्द होना जरूरी है । फरमान पर लागू करवाने के लिए बजाप्ता कमेटियों का गठन किया गया था । दूसरी घटना ११ साल की कमला को बिरादरी की पंचायत के फरमान पर गिरवी रखा गया, जहाँ चार महीने तक गिरवी रखनेवाले पुरूषों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया । विरोध करने पर उसकी पिटाई भी होती रही । कमला के भाई द्वारा गाँव की एक लड़की से किया गया प्यार और दोनों का गाँव छोड़कर भाग जाना ही सजा की मुख्य वजह थी । पंचायतों के ये दोनों फैसले मध्ययुगीन सोंच पर आधारित है परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसे गैरकानूनी पंचायतों और पंचजनों को अधिकार और शक्‍ति कहाँ से प्राप्त हो रही है? यदि गाँव में कुछ लोगों द्वारा भी विरोध किया जाता तो ऐसी पंचायतों का आयोजन सफल हो पाता ? इन गाँवों और उनके समाज में महिलाओं के लिए बराबरी का हक अभी दूर की बात है । महिलाओं की संगठित ताकत अभी आकार ग्रहण नहीं कर पाती है । सरकार और प्रशासन को इससे कोई मतलब नहीं है कि किस तबके का अधिकार कुचला जा रहा है । समुदाय पंचायतों का काला इतिहास हमारे समाज में बहुत पुराना है और न सिर्फ हमारे देश में बल्कि आसपास के देशों में भी वह उतना ही बुरा, क्रूर और पिछड़ा है । ऐसी पंचायतें प्रेमियों के साथ अमानुषिक व्यवहार करती हैं । पेड़ से लटका देना, पीट-पीट कर मार डालना और बलात्कार ही, परिणामस्वरूप इन प्रेमियों को नसीब होता है । अंतर्जातीय विवाह को कानूनी मान्यता के बावजूद पंचायतें अभी भी दकियानूसी सोंच से ग्रस्त हैं और इन कानून को मान्यता नहीं देता है । पाकिस्तान की मुख्तारन माई का किस्सा तो काफी चर्चित हो चुका है जिसका सामूहिक बलात्कार जाति पंचायत के आदेश पर हुआ था । पुरूष प्रधान समाज में महिलाएँ आज भी पंचायतों के उलजुलूल फैसलों को मानने की अभिशप्त हैं । उनके पैरों में अदृश्य बेडियाँ जकड़ी हैं । जाति विशेष एवं असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देने में पंचायतों की प्रमुख भूमिका से लगता है कि खाप पंचायतों को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाय जिनमें व्यक्‍ति के अधिकार स्त्रियों एवं दलितों की अस्मिता का कोई सम्मान नहीं है । बिहार के मिथिला क्षेत्र में अमेरिका देवी, तिलिया देवी ने पंचायतों के फैसलों की परवाह किए बिना पुरूष प्रधान समाज से जमकर टक्‍कर लिया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है । हरियाणा में तो महिलाओं ने नशे के खिलाफ बिगुल फूँक दिया है और वहाँ अवैध दारू भट्‌ठियों को तहस-नहस कर दिया है । महिलाओं एवं युवाओं को अपने हक की रक्षा हेतु एकजुट होकर पंचायतों के गैरकानूनी फैसलों के खिलाफ विद्रोह करने के साथ मीडीया एवं सरकार तक पहुँचाने का कार्य करना होगा । तभी इन पंचायतों पर अंकुश लग सकेगी तथा मानवाधिकार सुरक्षित रहेगा और न्याय मिल पाएगा । वैश्‍वीकरण के इस युग में जमाना कहाँ से कहाँ चला गया किन्तु आज भी अशिक्षा एवं रूढ़िवादी परंपराओं के चलते गाँवों में विकास का प्रतिशत नहीं बढ़ पाया है । गाँवों में अभी भी संकीर्ण मानसिकता, द्वेष भावना तथा दूसरों के मामले में ताक-झाँक की परंपरा प्रभावी है इसलिए वहाँ एकाग्र और लगनशील भाव से कुछ खास करने का वातावरण ही नहीं पनप रहा है । बदलते परिवेश और जानकारी के अभाव के कारण ग्रामीण समाज अभी भी अंधे युग में पुरानी सोंच में ही जी रहा है । वास्तव में बदलाव की आँधी तो हमें गाँवों में पैदा करनी चाहिए । चलंत न्याय व्यवस्था तथा पुलिस पब्लिक संवाद के जरिए इन स्थितियों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है । अकेले पढ़ने, नौकरी करने, घूमने की आजादी अगर हमें अभी भी प्राप्त नहीं है तथा इन तथाकथित पंचायतों के मुखियाओं की कृपा से हमें आजादी नहीं मिल पायी तो हम कहाँ से स्वाधीन हो गए ?

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