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गॉधी की विरासत को संजोने की कोशिश

यूनेस्को के एक फैसले से अब भारत भी उन ११ देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा, जहां उसके विश्‍वस्तरीय दर्जे के संस्थान है । जबकि एशिया प्रशांत क्षेत्र में यह पहला होगा । यूनेस्को ने भारत में महात्मा गांधी शांति एवं सतत विकास शिक्षा संस्थान को स्थापित करने की हरी झंडी दे दी है । गांधी के विचार व दर्शन के जरिए दुनिया भर में शांति और ग्लोबल वार्मिग के बढ़ते खतरे के दौरे में सतत विकास की सोच के साथ खुलने वाला यह संस्थान दिल्ली में बनेगा । मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि दुनिया भर में इस तरह के यूनेस्को के ११ प्रथम श्रेणी के संस्थान हैं । उनमें भी इथोपिया और बेनेजुएला जैसे विकासशील देशों में सिर्फ तीन हैं, जबकि बाकी विकसित देशों में स्थापित हैंं । ऐसे में भारत में स्थापित होने वाला यूनेस्को (संयुक्‍त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक व सांस्कृतिक संगठन) का यह आला दर्जे का संस्थान एशिया प्रशांत क्षेत्र में पहला होगा । सिब्बल ने कहा कि दिल्ली में बनने वाला यह संस्थान विश्‍वस्तरीय होगा, जिसपर लगभग सौ करोड़ रूपए खर्च होंगे । जबकि उसके बाकी खर्चे के लिए यूनेस्को उसे सालाना ५०० हजार डॉलर की सहायता देगा । संस्थान के लिए दर्जन भर सदस्यों का एक संचालन मंडल होगा, जिसमें सात सदस्य एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों से होंगे । किसी फकीर की तरह वाले गांधीजी ने देश पर अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया । महज लंगोटी धारण करने वाले गांधी की सादगी पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल इस कदर खीजे कि उन्हें ‘अंधनंगा फकीर’ कह डाला । गांधी के नाम पर न तो कोई घर है और न कोई संपत्ति । आजीवन उन्होंने भौतिकवाद से दूरी बनाए रखी । हां, विरासत के नाम पर उनकी कुछ चीजें जरूर हैं जिन्हें खरीदकर भारत सरकार या नामी-गिरामी व्यवसायी देश पर गाहे-बगाहे एहसान जताने की कोशिश करते हैं । गांधीजी की पौत्री तारा गांधी भट्टाचार्य ने अपने दादा की विरासत की नीलामी पर रोक लगाने की मांग की है । उनका कहना है कि राष्ट्रपति की विरासत को महंगे दामों में बेचने से उनमें छिपे संदेश धूमिल पड़ जाते हैं । भट्टाचार्य का कहना है, ‘गांधीजी ताउम्र सीमित साधनों के प्रयोग पर जोर देते रहे । उनके कपड़े पहनने का ढंग किसानों जैसा था । जब वह दिल्ली में होते थे तो उनके पास न जूते थे, न मोजे । जिस आदमी की अपनी कोई संपत्ति ही न हो, उसके द्वारा इस्तेमाल की गई चीजें महंगे दामों मे खरीदी जा रही है । इस चक्‍कर में उनकी शिक्षाएं कहां पीछे छूट गई हैं । उन्होंने कहा कि बापू बहुत सी चीजों को लौटा दिया करते थे । उदाहरण के तौर पर किसी ने उन्हें चम्मच दी तो वह उसे वापस कर देते थे, क्योंकि खाने के लिए उन्हें एक ही चम्मच की जरूरत थी । इस तरह देखा जाए तो गांधीजी की बेची जा सकने वाली विरासतों की कमी नहीं है । उनकी कुछ चीजें जैसे उनकी पांडुलिपियों को बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है । उन्हें संग्रहालयों में रखा जाना चाहिए । ’ भट्टाचार्य ने सरकार को सुझाव दिया था कि हर चीज का गांधीजी के साथ संबंध नहीं जोड़ा जाना चाहिए । लेकिन अब भी कुछ लोग मानते हैं कि उनके पास कुछ है । हमें वह चीजें उनसे ले लेनी चाहिए । इसे विडंबना नहीं तो क्या कहेंगे कि गांधी परिवार द्वारा ही राष्ट्रपिता की विरासत को नीलामी के दिया जाता है । इस साल गांधीजी की घड़ी समेत पांच चीजों (प्लेट, कटोरी, चश्‍मा, चप्पल) की नीलामी की गई । उन्होंने ये चीजें अपनी पौत्री आभा गांधी को दी थीं । इन चीजों पर मालिकाना हक बताने वाले जेम्स ओटिस का दावा था कि परिवार के ही किसी सदस्य से उसे ये चीजें मिली ।

Comments

  1. बहुत सुलझा हुआ लेख है। असली बात यही है कि गाँधीजी की विरासत को समझने की जरूरत है।

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  2. क्या आप को नहीं लगता जिन लोगों ने गाँधी जी को उनके जीवन के अंत के समय हाशिये पर फेंक दिया था बाद में उन्ही लोगों ने उनको सबसे अधिक भुनाया और आज जिन लोगों ने उनकी हत्या की थी वो आज उनके मुखोटे के पीछे छुपने की कोसिस की है ... जहाँ तक सैद्धांतिक मामला है मै गाँधी जी से सहमत नहीं हूँ.... पर उतना ही उनके प्रति आदर भी है. साहस और जीवटता के वे सच में एक बड़े प्रतीक हैं, किन्तु शाशक वर्ग उनको भुनाने में क्यों सफल हो गया ये एक बड़ा सवाल है खुद गाँधीवाद के लिए भी.... बहरहाल आपके प्रयास के लिए आप को बधाई ....
    कभी फुर्सत में इसे भी देखें
    darasalyoon.blogspot.com

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  3. font me badlav ke karan kuch shabdon ka svaroop badal gaya hai par mujhe lagta hai mai apni baat preshit kar paa raha hun

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  4. gaandhi जी की asli viraasat क्या थी .... क्या कोई भी ये समझ paaya है ........ कम से कम rajnitigyon ने तो नहीं samjha ............

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  5. EK SULJHE HUE AUR BEHTREEN LEKH KE LIYE AAPKO
    BADHAEE.

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