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सादगी और मितव्ययिता के प्रदर्शन से उपजे प्रश्न

अगर किसी परिवार के सदस्य को किसी भी परिस्थिति या साधनवश अधिक आय होती है और वह बाकी सदस्यों की जरूरतों या अभावों की उपेक्षा करके अपनी सुख-सुविधाओं या अधिक आरामदेह स्थिति को प्राप्त करने में अपनी खर्च करता है तो निश्‍चित रूप से उसे आदर्श परिजन नही कहा जा सकता । इसी प्रकार जो व्यक्‍ति अधिकाघिक उपभोग आधारित हाई-फाई जीवनशैली जी रहा है उसे निश्‍चित रूप से आदर्श नागरिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस प्रकार की जीवनशैली के लिए जो पैसा आ रहा है और खर्च किया जा रहा है वह समाज में आर्थिक विषमता-असमानता को बढावा देकर ही संभव है । भले ही वह कमाई और खर्च कानूनन वैध हो हमारे यहां “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा इसी पर आधारित है कि हम दूसरों को दुखी देखकर स्वयं भी उनके दुख में सम्मिलित होने की भावना रखें, न कि उनके दुख और अपने सुख के बीच की खाई को चौड़ा करने में अपनी प्रगति समझें । राजस्थान पत्रिका से जुड़ी जयपुर की तेजस्वी महिला पत्रकार सोमाद्री शर्मा का कहना बड़ा समीचीन लगता है - “गरीबी की रेखा, सोच की सीमा, धर्मों की दीवारें हैं चारों तरफ फिर भी कहते हैं हम आजाद हैं, आइए इन रेखाओं, सीमाओं, दीवारों को गिरा दें उज्जवल भारत का फंडा फहरा दें । ”इसलिए हमारी संस्कृति में जिनको महापुरूष का दर्जा दिया गया वे सभी त्याग आधारित सादगीपूर्ण जीवनशैली के ही उपासक रहे हैं । पटना के चर्चित प्रोफेसर मटुकनाथ एवं जूली ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि “सादगी जीने की चीज है दिखाने की नहीं । ” सादगी जीने की चीज है, दिखाने की नहींजैसे रेलगाड़ी में कई क्लास होते हैं- जनरल, स्लीपर, एसी-३, एसी-२, एसी-१ आदि, इसी तरह हवाई जहाज में भी क्लास होते हैं । सबसे सस्ता इकोनॉमी क्लास कहलाता है । बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता, मंत्री आदि इसमें सफर नहीं करते । वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कम खर्च करने का अभियान चलाया है । कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाधी इकोनॉमी क्लास में यात्रा करके उदाहरण प्रस्तुत कर चुकी हैं । राहुल गांधी ने एक कदम और बढ़कर ट्रेन से यात्रा की है । सोनियाजी और राहुलजी से मैं कहना चाहूंगा कि सादगी जीने की चीज है, दिखाने की नहीं और आरोपित करने की तो बिल्कुल ही नहीं । सादा जीवन था महात्मा गांधी का और देशरत्‍न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का । राष्ट्रपति का वेतन था उस समय दस हजार रूपये । देशरत्‍न का काम सत्रह सौ रूपये में चल जाता था । वे इतना ही वेतन उठाते । शेष देश के नाम पर छोड़ देते थे । सादगी से जीना किसी का स्वभाव होना चाहिए । सादा जीवन जीने में आनंद का अनुभव होना चाहिए, तब तो सादगी सुंदर है । वरना, दिखावटी और आरोपित सादगी खतरनाक होती है । वह एक धोखे की दीवार निर्मित करती है । जैसे सोनिया गांधी ने कुछ दिनों पहले दिल्ली से मुंबई की यात्रा विमान की इकोनॉमी क्लास में की थी । कहते हैं कि इसकी अच्छी कीमत एयर इंडिया को चुकानी पड़ी । उनकी सुरक्षा के मद्‌देनजर उनके आगे-पीछे और अगल-बगल की कुछ सीटों को खाली रखना पड़ा । मैं वित्तमंत्री को सलाह देना चाहूंगा कि अगर वास्तव में आप खर्च पर किफायत करना चाहते हैं तो हर महीने जितने भी मंत्री और नेता हैं, उनके संपूर्ण खर्च का एक ब्यौरा बुलेटिन के माध्यम से जनता के सामने रखने की कृपा करें । जनता जब देखेगी कि एक-एक मंत्री का मासिक खर्च करोड़ में पहुंच जाता है तो उसकी आंखें फटी की फटी रह जाएगी । वह फटी आंखे ही अगले चुनाव में अपना हिसाब चुकता कर लेगी । इसके लिए आपको माथापच्ची करने की जरूरत नहीं । अगर यह नहीं कर सकते तो लग्जरी क्लास ही खत्म कर दीजिए, क्योंकि जब तक वह क्लास रहेगा, तब तक उसमें चढ़ने के लिए प्रभुत्वशाली वर्गों में होड़ रहेगी । राजनीतिक पाखंड के कारण बेचारे शशि थरूर कष्ट में पड़ गए । मितव्ययिता अभियान ने पहले उनसे पंच सितारा होटल छीना और अब हवाई जहाज लग्जरी क्लास भी छीन रहा है ! खैर, शशि थरूर बेचारे को तंग मत कीजिए । जिस समय आप उन्हें सांसद बनाकर विदेश मंत्री बना रहे थे, क्या उस समय उनको नहीं जान रहे थे ? और विदेश राज्यमंत्री से मैं कहूंगा कि प्यारे शशि थरूर, प्रमाणिक बने रहना जरूर ! राहुल ने चेयर कार से की यात्रा फिजूलखर्ची रोकने के अभियान में शामिल कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सांसद के रूप में दी गई विशिष्ट दर्जे की सुविधा का उपयोग करने की बजाए शताब्दी एक्सप्रेस में चेयर कार से लुधियाना की यात्रा की । सूखे के समय अपनी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सादगी के संदेश को आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी ने शताब्दी एक्सप्रेस के चेयर कार की अगली कतार में बैठे, उनके साथ एसपीजी के सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे । राहुल ने स्टेशन पर फूल लेने से भी इनकार करते हुए कहा कि यह केवल विशेष दर्जा प्राप्त यात्रियों के लिए है और उन्होंने प्लास्टिक के कप में अन्य यात्रियों की तरह पानी उपलब्ध कराने की मांग की । राहुल ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से लुधियाना के लिए यात्रा शुरू की जहां उन्हें पार्टी के एक कार्यक्रम में शामिल होना था । इकनॉमी क्लास में बैठे प्रणवइधर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी विमान के इकनॉमी क्लास से चेन्‍नई की यात्रा की । प्रणव मुखर्जी चेन्‍नई में एक समारोह में हिस्सा लेने गए थे जहां उनका द्रमुक के संस्थापक दिवगंत सी एन अन%नादुरई की स्मृति में सिक्‍का जारी करने का कार्यक्रम था । विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर के पांच सितारा होटल में रुकने से उठे विवाद के बाद मुखर्जी ने फिजूलखर्ची रोकने के उपाय लागू किए थे ज्सके दिशा निर्देशों में मंत्रियों के लिए घरेलू एवं आंतरिक उड़ान के दौरान इकनॉमी क्लास से यात्रा करने की बात कही गई है । बापू की सादगी अपनाएं : लालूसादगी भरे जीवन एवं फिजूलखर्ची को लेकर छिड़ी बहस के बाद राजद प्रमुख और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से कहा कि दूसरों को सादगी भरा जीवन जीने का सुझाव देने से पहले वे स्वयं महात्मा गांधी के सादगी भरे जीवन और मितव्ययता के तरीकों को अपनाएं । लालू ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर केवल सुझाव दिया जाना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि संत जैसा जीवन स्वयं जीकर दिखाना होगा । सिंह, गांधी और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार सहित केंद्र में उच्च पदों पर आसीन अन्य लोगों को महात्मा गांधी के सादगी भरे जीवन और मितव्ययता के तरीकों को अपनाने की नसीहत देते हुए लालू ने कहा कि जब उच्च पदों पर आसीन लोग ऐसा करेंगे तभी दूसरे लोग भी उसका अनुसरण करेंगे । नवभारत टाईम्स ने अपने संपादकीय “सादगी और स्वांग” में लिखा है कि “ सरकार चलाने में कुछ दिन सादगी बरतने का एक मामूली प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल में भारी उथल-पुथल की वजह बन गया है । दो मंत्रियों के फाइव स्टार होटलों में रहने का मामाला अभी गर्म ही था कि हवाई जहाज के इकॉनमी क्लास में सफर करने की सलाह भर से कई मंत्रियों से बगावत की सी मुद्रा अपना ली । जवाब में दूसरे छोर पर जाते हुए कांग्रेस के एक प्रवक्‍ता ने यहां तक कह दिया कि इकॉनामी क्लास तो क्या, जरूरत पड़ने पर वे जहाज की सामान रखने वाली . जगह में भी बैठकर यात्रा करने को तैयार हैं । सादगी क्या सचमुच कोई ऐसा मुद्‌दा है, जिस पर इतनी कहासुनी की जरूरत हो ? नब्बे साल पहले अपनी चंपारण यात्रा में गांधी ने गांव के एक औरत के पास सिर्फ एक कपड़ा होने की मजबूरी देखकर जीवन भर एक ही धोती में गुजारा करने का व्रत ले लिया था । इसकी घोषणा करने के लिए उन्होंने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, न ही अपने किसी साथी या कांग्रेस के किसी सदस्य से अपनी तरह ही कपड़ा धारण करने का आग्रह किया । पार्टी में उनके सबसे निकत होने का गौरव जवाहर लाल नेहरू को प्राप्त हुआ, जिनके कपड़ों के बारे में कहा जाता है कि वे पेरिस से धुल कर आते थे । गांधी के त्याग की कहानियां बिना कोई हंगामा किए कस्तूरी की गंध की तरह धीरे-धीरे फैलीं और उनके ,मुत्यु के सालों बाद तक इस महादेश की संस्कृति में शामिल रहीं । अपने प्रेरणा स्त्रोतों में उस गांधी को भी गिनने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार अगर अपने कामकाज में सचमुच सादगी बरतना चाहती है तो सबसे पहले उसे इसको एक साल के आपातकालीन उपाय के रूप में लेना बंद कर देना चाहिए । यह एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसका अनुपालन मेम या सर्कुलर निकाल कर हर किसी से कराया जाना जरूरी नहीं है । कुछ नेता भी अगर इसे अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें तो इसका असर नीचे तक जरूर जाएगा । लेकिन इसको अगर सरकारी तरीके से, वह भी कुछ महीनों के लिए अमल में लाने का प्रयास किया जाएगा तो मद्य न्षेध जैसे टोटकों की तरह देश में इस पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी । इसमें कोई शक नहीं कि यह समय बड़बोलेपन और दिखावेबाजी को महिमामंडित करने का है और सरकारों की भूमिका इसे रोकने के बजाय बढ़ावा देने की हो गई है । होटल, एयरलांस और कई अन्य लग्जरी सेवाओं का तो आधा कारोबार ही मंत्रियों, अफसरों और जन प्रतिनिधियों पर हो रहे मोटे सरकारी ख्रर्च के बल पर चलता है । “बिजनेस स्टैण्डर्ड ने अपने संपादकीय मितव्ययिता का प्रदर्शन या कांग्रेस का प्रहसन ” में लिखा विदेश और विदेश राज्य मंत्री की शाहखर्ची पर विवाद के बाद मितव्ययिता के नाम पर कांग्रेस के कुछ नेता जो स्वांग कर रहे हैं, उससे शायद ही कोई मकसद हल होता दिख रहा है । पिछले दिनों राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रणव मुखर्जी ने जो यात्राएं की उनमें जनप्रतिनिधियों के लिए कोई नजीर कायम करने से ज्यादा प्रदर्शन की झलक ज्यादा थी । राहुल गांधी ने ट्रेन से यात्रा की । लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए हर स्टेशन पर सुरक्षा का भारी इंतजाम था । आखिरकार सुरक्षा पर इस भारी खर्च पर क्या कहेंगे? विमान की इकोनॉमी क्लास को पशुओं का बाड़ा करार देने वाले शशि थरूर इसमें यात्रा करते हुए नजर आए । प्रणव मुखर्जी ने सांसदों को सरकारी खजाने पर बोझ घटाने का उपदेश दिया और सोनिया गांधी ने थरूर और कृष्णा को साफ-साफ संदेश दे दिया कि उन्हें जनता के सामने जवाबदेही का न सही जवाबदेही के नाटक का प्रदर्शन तो करना ही चाहिए । पिछले दिनों सरकार ने जिस तरह इकोनॉमी को एक कई पैकेज दिये, उसने राजकोषीय घाटे को लगातार बढ़ाया है । केंद्र और राज्यों का सकल राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी के दस फीसदी तक पहुँच चुका है । ऐसे में जनता को यह संदेश देना जरूरी था कि प्रतिनिधियों के अनाप-शनाप खर्चे से राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर और दबाव नहीं बढ़ाया जाएगा । अर्थव्यवस्था में भले ही रिकवरी के संकेत दिखने लगे हों लेकिन अभी यह दूर है । पिछले सप्ताह से मंहगाई दर फिर बढ़ने लगी है, ऐसे में आर्थिक नीतियों पर एक बार फिर दबाव बनेगा । जब सरकार अर्थव्यवस्था के संकट से निजात पाने में एड़ी-चोटी का जोर एक किए हुए है तो ऐसे में जनता के सामने संयमित होकर खर्च करने का आदेश देना लाजिमी था । आखिर अभी हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं । कांग्रेस को एक जिम्मेदार पार्टी के तौर पर जनता के बीच जाना है । ऐसे में मितव्ययिता न सही इसका नाटक तो किया ही जा सकता है । कांग्रेस को इस अभियान से फायदे की उम्मीद थी लेकिन ऐसे प्रहसनों से वह हंसी का पात्र बन रही है । लोगों को पता है कि यह प्रचार पाने और मीडिया में अपनी चवि चमकाने की कोशिश है । जब शशि थरूर इकोनॉमी क्लास में यात्रा करने वाले लोगों को मवेसी कह सकते हैं तो इस देश के गांवों में रहने वाले लोग उनकी नजर में कीद़्ए-मकोड़ों से ज्यादा की हैसियत शायद ही रखते होंगे । राहुल गांधी भले ही ट्रेन के एसी कोच में सफर करके इतरा रहे हों लेकिन इस देश में आम लोग कैसे यात्रा करते हैं, यह उन्हें जनरल डिब्बे में यात्रा करने पर ही पता चलेगा । दर‍असल कांग्रेस के मंत्री और सांसद मितव्ययिता की जो कदम उठाते दिख रहे हैं उनमें उनकी सदिच्छा नहीं है । इसलिए जनता इन्हें शक की निगाह से देख रही है । ” दैनिक जागरण के सम्पादकीय ने “आधी-अधूरी पहल” शीर्षक अंतर्गत लिखा है कि -फिलहाल यह कहना कठिन है कि वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा इकोनामी क्लास में हवाई सफर करने से उन केंद्रीय मंत्रियों को सही संदेश मिल गया होगा जो फिजूलखर्ची रोकने के कांग्रेस के अभियान को लेकर नाम-भौं सिकोड़ रहे हैं । यदि सभी केंद्रीय मंत्री और विशेष रूप से कांग्रेस के मंत्री इकोनामी क्लास में हवाई सफर करना शुरू कर दी हैं तो भी इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि फिजूलखर्ची पर लगाम लग गई । यह समझ पाना कठिन है कि कांग्रेस किफायत बरतने के अपने अभियान को केवल अपने ही मंत्रियों और सांसदों द्वारा फिजूलखर्ची की जा रही है तो फिर यह अभियान सभी पर लागू होना चाहिए और कम से कम उसका दायरा संप्रग तक तो जाना ही चाहिए । यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के मंत्री और सांसद अपने यात्रा खर्च को सीमित कर लेते हैं तो इसके जो भी नतीजे सामने आएंगे वे भी अत्यंत सीमित होंगे, क्योंकि फिजूलखर्ची केवल यात्राओं के दौरान ही नहीं होती । केंद्रीय मंत्रियों के यात्रा व्यय के अतिरिक्‍त अन्य अनेक खर्च ऐसे हैं जिनमें अच्छी-खासी धनराशि खर्च हो रही है । यदि केंद्रीय मंत्रियों के केवल यात्रा खर्च और अन्य खर्चों को शामिल कर लिया जाए तो यह राशि करीब दो सौ करोड़ रूपये पहुंच जाती है । यह खर्च किस तेज से बढ़ता चला जा रहा है, इसका प्रमाण यह है कि वित्तीय वर्ष २००५-०६ में वेतन और यात्रा खर्च और अन्य भत्तों में व्यय कुल राशि सौ करोड़ रूपये से भी कम थी । यदि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता फिजूलखर्ची रोकने के प्रति वास्तव में गंभीर है तो उसे सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव करना होगा और साथ ही उन अनेक परंपराओं से पीछा छुड़ाना होगा जो एक लंबे अर्से से चली आ रही है । फिजूलखर्ची केवल मंत्रियों द्वारा नहीं , बल्कि शीर्ष नौकरशाहों द्वारा भी की जा रही है । निःसंदेह यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उच्च पदों पर बैठे नौकरशाह और नेतागण अपनी जीवनशैली को सामान्य व्यक्‍तियों की तरह ढाल लें, लेकिन यह भी नहीं होना चाहिए कि उनकी विशिष्टता राजसी ठाठ-बाट को मात देती नजर आए । यह भी विचित्र है कि फिजूलखर्ची रोकने का यह अभियान इस आधार पर शुरू किया गया है कि देश सूखे और मंदी का सामना कर रहा है । इस अभियान से तो यह प्रकट हो रहा है कि यदि सूखे और मंदी का दुर्योग एक साथ सामने नहीं आया होता तो कोई फिजूलखर्ची रोकने पर ध्यान नहीं देता । फिजूलखर्ची तो प्रत्येक परिस्थिति में रोकी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा न करने का अर्थ है संसाधनों की बर्बादी । एक ऐसे देश में जहां लगभग तीस प्रतिशत लोग भयावह निर्धनता से जूझ रहे हों वहां यह शोभा नहीं देता कि मंत्रीगण राजसी ठाठ-बाट में रहें । इससे भी अधिक अशोभनीय यह है कि जब इस ठाठ-बाट का उल्लेख किया जाए तो विरोध और नाराजगी के स्वर उभरें । इन स्वरों का उभरना यह बताता है कि हमारे आज के औसत राजनेता किस तरह अभी भी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं । ऐसी मानसिकता वाले राजनेता उच्च पदों पर तो विराजमान हो सकते हैं, लेकिन उन्हें लोकसेवक नहीं कहा जा सकता । ” कांग्रेस ड्रामा बंद कर महंगाई कम करे ः भाजपाभाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि कांग्रेस और केंद्र सरकार का सादगी का फोटो सेशन नौ की लकड़ी नब्बे खर्च का नाटकीय रूपांतर है । महंगाई से लोगों का ध्यान हटाने के लिए कांग्रेस के नेता नौटंकी कर रहे हैं । नकवी ने कांग्रेस एवं केंद्र सरकार की कथित सादगी मुहिम पर व्यंग्य करते हुए कहा कि एसी ट्रेन में चलने और विमान के इकानॉमी क्लास में सफर करने से क्या फायदा, जिसमें ट्रेन की पूरी बोगी और जहाज की आधी सीटें सादगी के नायकों के सुरक्षा अमले के लिए बुक कर दी जाती हैं । उन्होंने कहा कि सादगी सफर में नहीं सोच में होनी चाहिए । गरीबों की झोपड़ी या ट्रेनों, विमानों के सस्ते दर्जे में सफर का फोटो सेशन देश के बद से बदतर हो रहे हालात को ठीक नहीं कर सकते बल्कि यह देश की गरीबी, बेरोजगारी, आतंकवाद, महंगाई जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश मात्र है । उन्होंने कहा कि कांग्रेस सादगी के फोटो सेशन के माध्यम से दुनिया को यह संदेश दे रही है कि भारत विश्‍व का सबसे गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर देश बन गया है और इसलिए मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक गरीब भारत का हिस्सा बनकर दिखाना चाहते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि भारत आज भी दुनिया के बहुत सारे देशों से ज्यादा अमीर और आर्थिक रूप से मजबूत है । उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार की पिछले पांच सालों की नीतियों का नतीजा रहा है कि देश महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी की चौंमुखी समस्या से बुरी तरह जूझने लगा है । फैसला आसान नहींसुरक्षा खतरों के कारण सोनिया का बिजनेस क्लास के बजाय इकॉनामी क्लास में हवाई यात्रा करने का फैसला आसान नहीं था । सूत्रों के अनुसार एजेसियाँ इसके लिए तैयार नहीं थी मगर सोनिया के फैसले के कारण सुरक्षा एजेंसियों को साधारण इकॉनामी क्लास में उनकी यात्रा की व्यवस्था करनी पड़ी । हालांकि सोनिया के लिए सादगी कोई दिखावे की चीज नहीं है । कम ही लोगों को मालूम होगा कि सोनिया के अलावा महासचिव राहुल गाँधी भी जब रायबरेली और अमेठी जाते हैं तो वे लखनऊ तक इंडियन एयरलाइंस की सामान्य उड़ान से ही जाते है । लखनऊ से अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों तक का सफर आमतौर पर सड़क के रास्ते पूरा करते हैं । अमेठी में राहुल अपने परिवार की पुरानी क्वॉलिटी कार से ही गाँव-देहातों के दौरे करते है । रात को सेल्फ ग्रुप की बैठकों में भाग लेने गाँवों में चले जाते हैं और वहाँ किसी दलित परिवार के यहाँ खाना खाकर वहीं चारपाई पर सो भी जात हैं । इंग्लैंड के युवा विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड को साथ लेकर राहुल ने अमेठी ले जाकर रात को चारपाई पर सुलाया था । राजीव गाँधी भी खुद जिप्सी चलाते हुए गाँव घूमते थे और सड़क किनारे ठाबे पर रूकर चाय पीते थे । उन दिनों राजनीति से दूर सोनिया भी कई बार धूल भरी कच्ची सड़कों पर राजीव गाँधी के साथ-साथ होती थी । नेहरू गाँधी परिवार में सादगी पारंपरिक है । एचएमटी की रिस्ट वॉच इंदिरा गाँधी ने हमेशा पहनी । मेड इन इंडिया की गौरव गाथा एचएमटी से ही शुरू हुई थी । इंदिराजी की खादी की साड़ियाँ प्रियंका पहनती हैं । कांग्रेस प्रवक्‍ता अभिषेक सिंघवी ने कहते हैं कि सोनिया गाँधी की सादगी कोई नयी बात नहीं है । बीजेपी की आलोचना का जबाब देते हुए अभिषेक ने कहा कि करने की बात तो दूर सत्ता में रहने के दौरान बीजेपी ने कभी सादगी के बारे में सोंचा तक नहीं था । सरकारी गाड़ी का बेजां इस्तेमाल नहींआने वाले दिनों में अधिकारी, सरकारी गाड़ियों से न तो पर्सनल काम कर पाएंगे और न ही उसे शॉपिंग के लिए ले जा पाएंगे । खर्चे में कटौती के लिए सरकार अब सरकारी गाड़ियों के इस्तेमाल को दुरूस्त बनाने और उसके इस्तेमाल में पेट्रोल पर बेतहाशा बहते धन पर अंकुश लगाने पर विचार कर रही है । वित्त मंत्रालय जल्द ही सरकारी गाड़ियों के इस्तेमाल के लिए ‘लॉग बुक’ सिस्टम सख्ती से लागू करने जा रहा है । इस बारे में सभी मंत्रालयों से विमर्श चल रहा है । वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मौजूदा समय में सरकारी अधिकारियों के सेवा में जो गाड़ियां लगी है, उनमें लॉग बुक के नाम पर बस औपचारिकता पूरी की जाती है । ट्रांसपोर्ट विभाग अपने रेकॉर्ड में बस यह लिख देता है कि फलां गाड़ी फैला अधिकारी की सेवा में लगी हुई है । इसके बाद गाड़ी कहां-कहां जाती है, इसको कोई हिसाब-किताब नहीं रखा जाता । मगर अब ऐसा नहीं होगा ।
(- गोपाल प्रसाद)

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