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चिन्तन से परिवर्तन

स्वामी रामदेव (योग गुरू) - मैं देश में मानसिक परिवर्तन चाहता हूँ। श्री अर्जुन नारायण देव (नेता बी. आर.एस.पी) - समर्पण एवं अनुशासन नेता बना सकते हैं। श्री शिव खेड़ा (पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बी. आर.एस.पी) - शिक्षा एवं न्याय के माध्यम से ही आजादी संभव है। श्री संदीप दूबे (राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष बी. आर.एस.पी) - मध्यम वर्ग के लोग भी नेता बन सकते हैं। श्री मनोज पंडित (राष्ट्रीय युवा महासचिव बी.आर.एस.पी) - भारत का निर्माण युवा हाथों से ही संभव है । संजय पाण्डेय (राष्ट्रीय युवा सचिव बी.आर.एस.पी) - नेता जनता के नौकर हैं । इंजी. चन्द्र कान्त त्यागी (राष्ट्रीय महासचिव बी.आर.एस.पी.) -भारत के कुशासन को सुशाशन में बदलने के लिए युवाओं की भागीदारी आवश्यक है । श्री सुरेश मुद्‌गल (दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बी. आर.एस.पी.) - देश में राजनीति के सामाजीकरण की आवश्यकता है। डा. संगीता बोरसे (युवा उपाध्यक्ष बी. आर.एस.पी) - सर्वप्रथम अपने आप को बदलो।श्री राकेश कुमार सामा (नेता बी. आर.एस.पी.)-युवाओं के स्थिति में सुधार हुए बिना भारत का कल्याण संभव नहीं । श्री आर. के. जैन (नेता बी. आर.एस.पी.) - युवाओं को अपने मौलिक अधिकार समझने होंगे । श्री आर. के. टन्डन (नेता बी. आर.एस.पी.) - भ्रष्टाचार निवारण के लिए युवा ही देश में माहौल तैयार कर सकता है । श्री अवतार सिंह (नेता बी. आर.एस.पी.) -जनता को जागरूक बनना होगा, तभी उसके अधिकार सुरक्षित रह सकते हैं । श्री आर. के. गोयल (नेता बी. आर.एस.पी) - समानता के लिए जाति विहीन राजनीति का होना आवश्यक है । श्री अमित चौधरी (नेता बी. आर.एस.पी.)- संविधान में प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकारों के रक्षार्थ राष्ट्रीय स्तर पर जनान्दोलन युवा ही खड़ा कर सकता है। श्री गोपाल प्रसाद (सम्पादक, समय दर्पण) - वंशवाद में जकड़ी भारतीय राजनीति को मुक्‍त करना होगा ।

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वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन …